महाकालेश्वर मंदिर का इतिहास | Mahakaleshwar temple history in Hindi

By | September 29, 2022
महाकालेश्वर मंदिर का इतिहास

भारत का ऐतिहासिक शहर जो उज्जैन के नाम से जाना जाता है, यह प्राचीन मंदिरों, स्मारकों और अन्य पर्यटक आकर्षणों के लिए बेहद प्रसिद्ध है। हर साल यहां भक्तों, धार्मिक प्रेमियों, अनुयायियों, इतिहास के शौकीन व्यक्तियों की भारी संख्या में भीड़ देखी जाती है। इन सबके अलावा उज्जैन अपने 12 साल में एक बार होने वाले भव्य कुंभ मेले के लिए भी जाना जाता है। इस दौरान यहां करोड़ों की संख्या में लोगों की भीड़ देखी जाती है। यदि आपने कभी Shree Mahabaleshwar Temple history in Hindi के बारे में नहीं सुना या फिर आपको इसके बारे में पूरी जानकारी नहीं पता तो आइए जानते हैं उज्जैन के श्री महाकालेश्वर मंदिर के बारे में। महाकालेश्वर मंदिर कहां है, महाकालेश्वर मंदिर किसने बनवाया था और महाकालेश्वर मंदिर का इतिहास क्या है इन सभी से संबंधित जानकारी आपको यहां मिलने वाली है।

महाकालेश्वर मंदिर का परिचय :

उज्जैन तीर्थयात्रा का एक महत्वपूर्ण स्थान है और शैवों के लिए सबसे पवित्र हिंदू शहरों में से एक है। अगर आप भी उज्जैन घूमने की योजना बना रहे हैं, तो एक बार यहां के कुछ प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन जरूर करें। देशभर के बारह ज्योतिर्लिंगों में ‘महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग’ का अपना एक अलग महत्व है। महाकाल मंदिर के दक्षिण मुखी होने से भी इस मंदिर का महत्व और बढ़ जाता है। महाकालेश्वर मंदिर विश्व का एक मात्र ऐसा शिव मंदिर है, जहां दक्षिणमुखी शिवलिंग मौजूद है। यह स्वयंभू शिवलिंग के नाम से भी शूमार है, जो बहुत जाग्रत है। इसी कारण यहां चार बजे भस्म आरती करने का विधान भी है।

महाकालेश्वर मंदिर की स्थापना :

दोस्तों, Mahakaleshwar Mandir kahan hai इस बारे में काफी लोगों को जानकारी नहीं है। ऐसा माना जाता है कि परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी में महाकालेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया था। उसके बाद सिं‍धिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्वार करवाया था। यदि आप नहीं जानते कि महाकालेश्वर मंदिर कहां स्थित है तो आपको बता दें कि यह मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में स्थित प्रमुख मंदिर है। पुराण, महाभारत और कालिदास जैसे महाकवियों की रचनाओं में इस मंदिर का मनोहर वर्णन मिलता है।

महाकालेश्वर मंदिर का इतिहास :

स्वयंभू, भव्य और दक्षिणमुखी होने के कारण महाकालेश्वर महादेव को अत्यन्त पुण्यदायी माना जाता है। इसके दर्शन मात्र से ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। महाकवि कालिदास ने मेघदूत में उज्जयिनी की चर्चा करते हुए इस मंदिर की प्रशंसा की है। उन्होंने इस मंदिर के जीर्णोद्धार की ओर विशेष ध्यान दिया‌। इसलिए आज मंदिर अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त कर सका है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाकालेश्वर मंदिर में इस शिवलिंग की स्थापना राजा चन्द्रसेन और गोप बालक रूप की कथा से जुड़ी है। कथा से हनुमानजी का संबंध भी जुड़ा हुआ है।

महाकालेश्वर हैं 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे खास :

12 ज्योतिर्लिंगों में से महाकालेश्वर ही एकमात्र सर्वोत्तम शिवलिंग है। कहा जाता है कि जिस प्रकार आकाश में तारक शिवलिंग और पाताल में हाटकेश्वर शिवलिंग का महत्व है ठीक उसी प्रकार पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग हैं।

महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती होने का कारण :

हर सुबह महाकाल की भस्म आरती करके उनका श्रृंगार होता है और उन्हें जगाया जाता है। इसके लिए वर्षों पहले शमशान से भस्म लाने की परंपरा थी। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से अब कपिला गाय के गोबर से बने कंडे, शमी, पीपल, पलाश, बड़, अमलतास और बेर की लकड़‌ियों को जलाकर तैयार क‌िए गए भस्‍म को कपड़े से छानने के बाद इस्तेमाल करना शुरू हो गया है। केवल उज्जैन में आपको यह आरती देखने का सुनहरा अवसर प्राप्त होता है। दरअसल भस्म को सृष्टि का सार माना जाता है। इसलिए महाकालेश्वर प्रभु हमेशा इसे धारण किए रहते हैं।

उज्जैन के राजा महाकाल का मंदिर :

पौराणिक कथाओं के मुताबिक उज्जैन का एक ही राजा है और वह है महाकाल बाबा। विक्रमादित्य के शासन के बाद से यहां कोई भी राजा रात में नहीं रुक सका। जिसने भी यह दुस्साहस किया है, वह संकटों से घिरकर मारा गया। आज भी यह कहा जाता है कि उज्जैन में आज भी सिर्फ एक ही राजा है जो महाकालेश्वर हैं और एक साथ दो राजा इस मंदिर में नहीं रह सकते। कोई भी व्यक्ति यदि वह किसी मंत्री या राजा के परिवार अथवा कुल खानदान से संबंध रखता है तो वह रात के समय इस मंदिर में नहीं रुक सकता। वर्तमान में भी कोई भी राजा, मुख्‍यमंत्री और प्रधानमंत्री आदि यहां रात के समय नहीं रुक सकते।

महाकालेश्वर को महाकाल कहने का कारण :

पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक काल के दो अर्थ होते हैं- एक समय और दूसरा मृत्यु। महाकाल को ‘महाकाल’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि प्राचीन समय में यहीं से संपूर्ण विश्व का मानक समय निर्धारित होता था। इस ज्योतिर्लिंग का नाम ‘महाकालेश्वर’ रखे जाने का भी यही कारण है। हालांकि महाकाल कहने का संबंध पौराणिक मान्यता से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए प्राचीन समय से लेकर आज तक इस मंदिर का नाम महाकालेश्वर मंदिर है।

महाकालेश्वर मंदिर की उत्पत्ति :

उज्जैन महाकाल मंदिर में शिव लिंग स्वयंभू है। महाकाल को कालों का काल भी कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान महाकाल हमेशा काल को हर लेते हैं। बाबा महाकाल की उत्पति अनादि काल में मानी गई है। महाकालेश्वर मंदिर में सामन्यतः चार आरती होती हैं, जिनमें से सुबह होने वाली भस्म आरती के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से उज्जैन पंहुचते हैं। श्रद्धालुओं की अपनी मान्यताएं हैं कि जो भी वरदान भगवान् महाकालेश्वर से मांगों, वो हर इच्छा पूरी करते हैं। इसी मान्यता के चलते बड़ी संख्या में श्रद्धालु रोजाना महाकाल मंदिर पहुंचते हैं।

महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह का दृश्य :

महाकालेश्वर मंदिर के गर्भगृह में विराजित भगवान महाकालेश्वर का विशाल दक्षिणमुखी शिवलिंग है। इसी के साथ ही गर्भगृह में माता पार्वती, भगवान गणेश व कार्तिकेय की मोहक प्रतिमाएं भी हैं। इस मंदिर के गर्भगृह में नंदी दीप स्थापित है, जो सदैव प्रज्वलित होता रहता है। गर्भगृह के सामने विशाल कक्ष में नंदी की प्रतिमा विराजित है।

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के तीन भाग :

वर्तमान में महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग 3 खंडों में विभाजित है। निचले खंड में महाकालेश्वर, मध्य खंड में ओंकारेश्वर तथा ऊपरी खंड में श्री नागचन्द्रेश्वर मंदिर स्थित है। नागचन्द्रेश्वर शिवलिंग के दर्शन वर्ष में एक बार नागपंचमी के दिन ही करने दिए जाते हैं, जिस दौरान श्रद्धालुओं की बहुत अधिक भीड़ रहती है।

महाकालेश्वर मंदिर के खास नियम :

DAKOR MANDIR DARSHAN TIME TABLE || DAKOR KI PURI JANKARI HINDI 2022|| DAKOR KAISE JAYE

महाकालेश्वर मंदिर इतिहास (Mahakaleshwar Mandir ka itihaas) के बारे में तो आपने जाना अब महाकालेश्वर मंदिर के कुछ पुराने और माने जाने वाले खास नियमों की बात करें तो यहां महिलाओं को आरती के समय घूंघट करना पड़ता है। महाकालेश्वर मंदिर में पूजा आरती के दौरान कुछ नियम बनाए गए हैं। इसके बारे में यह भी कहा जाता है कि भस्म आरती के समय महिलाएं इस आरती को नहीं देख सकती हैं। इसके साथ ही आरती के समय पुजारी भी मात्र एक धोती में आरती करते हैं। अन्य किसी भी प्रकार के वस्त्र को धारण करने की मनाही रहती है। महाकाल की भस्म आरती के पीछे एक यह मान्यता भी है कि भगवान शिवजी श्मशान के साधक हैं, इस कारण से भस्म को उनका श्रृंगार-आभूषण माना जाता है। मान्यताओं के मुताबिक ज्योतिर्लिंग पर चढ़े भस्म को प्रसाद रूप में ग्रहण करने से रोग दोष से भी मुक्ति मिलती है।

निष्कर्ष :

हम उम्मीद करते हैं कि महाकालेश्वर मंदिर का इतिहास (Mahakaleshwar temple history in Hindi) से संबंधित सभी जानकारी आपको इस आर्टिकल के माध्यम से मिल गई होंगी। महाकालेश्वर मंदिर के बारे में यदि आप और भी कुछ जानकारी चाहते हैं तो हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए। साथ ही अपने दोस्तों के साथ भी महाकालेश्वर मंदिर के रहस्य और इतिहास को जरुर शेयर करें ताकि उन्हें भी महाकालेश्वर मंदिर का इतिहास (Mahakaleshwar temple history in Hindi) से संबंधित संपूर्ण जानकारी मिल सके।

  1. महाकालेश्वर मंदिर कहां है?

उत्तर : महाकालेश्वर मंदिर मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन नगर में स्थित है।

  • महाकालेश्वर मंदिर क्यों प्रसिद्ध है?

उत्तर : महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे खास है और पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग हैं।

  • महाकालेश्वर के दर्शन करने से क्या लाभ है?

उत्तर : मान्यता है कि महाकालेश्वर के दर्शन करने भर से ही मनुष्य के अंदर से मृत्यु का भय खत्म हो जाता है।

  • महाकालेश्वर के मंदिर की खास विशेषता क्या है?

उत्तर : महाकालेश्वर मंदिर की खास विशेषता यह है कि यह मंदिर दक्षिणमुखी है, जो पृथ्वी पर और कहीं नहीं है।

  • महाकालेश्वर मंदिर में राजघराने के लोग क्यों नहीं रह सकते?

उत्तर : उज्जैन में आज भी सिर्फ एक ही राजा है जो महाकालेश्वर हैं और एक साथ दो राजा इस मंदिर में नहीं रह सकते। कोई भी व्यक्ति यदि वह किसी मंत्री या राजा के परिवार अथवा कुल खानदान से संबंध रखता है तो वह रात के समय इस मंदिर में नहीं रुक सकता।

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